केंचुआ यानी केंद्रीय चुनाव आयोग ने बैठे-बिठाए बिहार में महागठबंधन को एक ऐसा मुद्दा दे दिया है जिसे चुनाव आयोग और भाजपा ना निगल पा रही है, ना उगल। इस पूरे घटनाक्रम में तेजस्वी यादव छा गए हैं, जबकि नीतीश कुमार पूरे परिदृश्य से गायब हो गए।
कल तेजस्वी यादव ने बिहार में तूफ़ान ला दिया और इसका समर्थन मिला 10 ट्रेड यूनियनों के भारत बंद को, जिसमें पूरे देश में 25 करोड़ श्रमिकों ने भाग लिया, जो भारत की जनसंख्या का लगभग 18% है।
यह बदलते भारत की तस्वीर है।
बिहार से ही भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की शुरुआत हुई थी, और कल की तस्वीरें यह दिखा रही थीं कि हर धर्म और जाति के लोग चुनाव आयोग की सनक से परेशान हैं। इस बार भी बदलाव की शुरुआत बिहार से ही होती दिख रही है।
नीतीश कुमार का पूरे परिदृश्य से गायब होना भी एक संकेत है कि वे मानसिक रूप से अस्वस्थ हैं, और यही कारण है कि उनके जनाधार में इस बार बिखराव संभव है।
जब दो प्रमुख दलों या गठबंधनों के बीच तीव्र चुनावी मुकाबला होता है, तो तीसरे दल हवा में उड़ जाते हैं और वोट दो ही गठबंधनों के पक्ष में ध्रुवीकृत हो जाते हैं। यही उत्तर प्रदेश में बसपा के साथ हुआ था, और यही अब बिहार में असदुद्दीन ओवैसी के साथ होने की संभावना है, क्योंकि इस बार महागठबंधन आक्रामक तेवर में है और एनडीए बचाव की मुद्रा में।
पिछले चुनाव में ओवैसी को वोट देने वाले मतदाताओं को अब यह एहसास हो चुका है कि उनकी गलती की वजह से ही बिहार में नीतीश कुमार और भाजपा की सरकार बन गई। वरना तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री बन गए होते।
इस बार शायद ही ओवैसी को वैसा समर्थन मिले, क्योंकि अब नीतीश कुमार परिदृश्य से पूरी तरह गायब हैं। उनके अस्वस्थ होने की चर्चा आम है, जेडीयू पर भाजपा का नियंत्रण है, और यह भी संभव है कि अगर भाजपा जीतती है तो कोई योगी या हिमंत बिस्वा सरमा जैसा मुख्यमंत्री बिहार में बना दिया जाए।
बिहार के ओबीसी वर्ग को अब यह बात अच्छी तरह समझ में आ चुकी है और इस बार वे पूरी तरह एकजुट दिख रहे हैं।
इस चुनाव का ट्रिगर प्वाइंट नीतीश कुमार की अदृश्यता है। यदि वे मंच पर आए भी, तो संभव है कि उनकी मानसिक स्थिति को लेकर सवाल और मज़बूत हों।
यही ट्रिगर प्वाइंट तमाम सर्वे में तेजस्वी यादव को बिहार का सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बना रहा है, लगभग 40% वोट समर्थन के साथ।
तेजस्वी यादव स्पष्ट, निर्भीक और निडर नेता हैं। परिवार पर तमाम मुकदमों के बावजूद वे डटे हुए हैं। उनकी राजनीति साफ़-सुथरी है। सोशल मीडिया पर उनके दो वीडियो वायरल हैं, एक मीडिया को लेकर और दूसरा मरहूम मोहम्मद शहाबुद्दीन के संदर्भ में। दोनों यह बताते हैं कि तेजस्वी यादव कितने निडर हैं।
बिहार विपक्षी गठबंधन का सबसे सफल मॉडल है, और उसका कारण भी तेजस्वी यादव ही हैं, जिन्होंने सभी दलों को ईमानदारी से जोड़े रखा है।
मगर हर राज्य में तेजस्वी यादव नहीं हैं। कहीं अरविंद केजरीवाल हैं, तो कहीं ममता बनर्जी और दोनों की विश्वसनीयता पर सवाल हैं।
ममता बनर्जी की राजनीति साफ है, भाजपा का मज़बूत होना उनके लिए फायदेमंद होता है। इससे भाजपा विरोधी वोट उनके पक्ष में ध्रुवीकृत हो जाते हैं, और कांग्रेस व वामदलों के लिए कोई जगह नहीं बचती।
पश्चिम बंगाल में उनका कोर वोट मुस्लिम है (लगभग 30%), और 7-8% ब्राह्मण वोटों पर भी उनकी पकड़ है। बंगाली समाज वैसे भी परिवर्तन से घबराता है, इसलिए ममता सिर्फ राज्य की सत्ता के बारे में सोचती हैं। भाजपा के मज़बूत होने की उनकी रणनीति उन्हें सुरक्षित रखती है।
केजरीवाल की अतिमहत्त्वाकांक्षा उन्हें खुद समाप्त कर देगी, दिल्ली जा चुकी है, और अगला चुनाव पंजाब भी ले जाएगा।
कुल मिलाकर, अगला एक साल भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। नरेंद्र मोदी जल्द ही 75 वर्ष के होने वाले हैं। जिस तरह वे विभिन्न देशों से सर्वोच्च नागरिक सम्मान लेकर महात्मा गांधी से महान बनने का नैरेटिव गढ़ रहे हैं, उससे लगता है कि वे किसी ‘रिटायरमेंट प्लान’ पर काम कर रहे हैं। वे महानता की एक ऊँची छवि गढ़कर रिटायर हो सकते हैं।
बाकी, देखते हैं… बदलाव की आहट तो आ ही रही है।
मेरी सलाह है कि कांग्रेस को अंदरुनी समझदारी दिखाते हुए अखिलेश यादव को INDIA गठबंधन का अध्यक्ष बना देना चाहिए। इससे बदलाव की बयार और तेज़ होगी और भाजपा का OBC नेक्सस टूट सकता है।