उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर ज़िले के चाँदा ब्लॉक स्थित मदारडीह गांव में सुनील यादव की हत्या का मामला भी उसी अन्यायपूर्ण ढर्रे पर आगे बढ़ता दिख रहा है, जैसा कि कौशांबी की पाल समाज की नाबालिग बेटी के साथ हुए बलात्कार प्रकरण या इटावा के यादव कथावाचक अपमान कांड में हुआ था।
सुनील यादव की लाश तीन दिनों तक उसके घर पर पड़ी रही, लेकिन एफआईआर तक दर्ज नहीं हुई। जब तक सामाजिक कार्यकर्ता और जनसंगठन सड़कों पर नहीं उतरे, तब तक पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। सामाजिक संगठनों के जनदबाव के बाद पूर्व विधायक संतोष पाण्डेय, उनके साले विवेक मिश्रा और मुन्ना निषाद के खिलाफ हत्या का मुकदमा पंजीकृत हुआ।
मदारडीह गांव में न कोई चक्का जाम हुआ, न कोई हिंसा हुई, फिर भी न्याय की मांग कर रहे ओबीसी सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ताओं पर ही दबाव बनाने के लिए योगी सरकार की जातिवादी पुलिस ने गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज कर दिए। सवाल उठता है कि क्या योगी आदित्यनाथ की सरकार में अब पिछड़े, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक समाज के लोगों को न्याय मांगना भी अपराध बना दिया गया है? क्या अब हत्या और बलात्कार के आरोपियों को सत्ता और जातीय वर्चस्व का संरक्षण प्राप्त है, और पीड़ित के पक्ष में खड़े होने वाले ही गुनहगार बना दिए जाएंगे?
कौशांबी, इटावा और अब सुल्तानपुर, इन तीनों मामलों में एक बात सामान्य है कि ओबीसी समाज पर अन्याय करने वाले आरोपियों को सत्ताधारी शासन-प्रशासन का संरक्षण प्राप्त है, और विपक्ष केवल औपचारिकता निभा रहा है। इटावा के कथावाचकों को बुलाकर सम्मानित कर देना प्रतीकात्मक राजनीति हो सकती है, लेकिन इन पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने की दिशा में कोई ठोस, सकारात्मक पहल या सामाजिक आंदोलन न होना, पूरे राजनीतिक तंत्र पर सवाल खड़े करता है।
यह दौर केवल अन्याय का नहीं, बल्कि न्याय की मांग करने वालों को भी अपराधी साबित करने की साजिश का दौर है। अगर अब भी ओबीसी समाज राजनीतिक पार्टियों के भरोसे बैठा रहा और एकजुट नहीं हुआ, तो आने वाला समय और भी भयावह हो सकता है।