आज पत्रकारिता की जिम्मेदारी और साख संकट में है। पहले जब कोई खबर होती थी, तो समाचारपत्र और अन्य मीडिया उसे दिखाते या छापते थे, तो यह उनकी जिम्मेदारी होती थी कि वे उसकी वास्तविकता की पड़ताल करें। इसके लिए वे अपने संवाददाता तक भेजते थे, सबूत इकट्ठा करते थे और पूरी जिम्मेदारी के साथ ठसक से खबर छापते थे।
अब खबरें सोशल मीडिया और व्हाट्सएप यूनिवर्स से फैलाईं जाती हैं, जिनकी न तो कोई जवाबदेही होती है और न ही तथ्य-जांच। जब विवाद बढ़ता है, तो ‘डिलीट फॉर एवरीवन’ के बटन से सारा पाप धुल जाता है।
फेक न्यूज़ का नया युग: किसके पास कंट्रोल है?
जिन्हें सूचना और विमर्श पर सबसे ज़्यादा पकड़ हासिल है, वही सबसे ढीट तरीके से झूठ भी फैलाते हैं। जैसे ‘अखिलेश यादव ने अपने पिता को चांटा मारा’ जैसी झूठी कहानी को बार-बार दोहराकर ऐसा नैरेटिव तैयार किया गया कि “कुछ कर तो सकते हैं, पर भरोसा नहीं करना चाहिए”। ये सिर्फ झूठ नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी मानसिक चाल है, खासतौर पर ओबीसी नेतृत्व को बदनाम करने के लिए।
इसी तरह पुण्य प्रसून वाजपेई ने 86 में से 56 यादव SDM की झूठी खबर फैलाकर अखिलेश जी के खिलाफ पिछड़ी जातियों को भड़काने का काम किया।
अब चित्रा त्रिपाठी बिना किसी जातीय जनगणना या आधिकारिक डेटा के ये कहती हैं कि “यूपी में पिछड़ों का हक यादव और कुर्मी ले गए”। ये कोई तटस्थ विश्लेषण नहीं, बल्कि एक ज़हरीली साजिश है, जिसका मकसद बहुजन समाज में दरार डालना है।
बहुजन समाज को इस तरह की ‘गोदी मीडिया’ की चालों से सावधान रहना होगा। यही मीडिया हमेशा से सवर्ण वर्चस्व बनाए रखने के लिए झूठ गढ़ती रही है। इनकी राजनीति साफ है, ‘बांटो और राज करो’। और इसी वजह से आज बहुजन समाज को पहले से ज्यादा जागरूक और एकजुट होने की जरूरत है।
सोशल मीडिया: झूठ का नया हथियार
सोशल मीडिया अब सूचना का नहीं, बल्कि भ्रम फैलाने का उपकरण बन गया है। यहां अधिकतर सूचनाएं नकारात्मक, सांप्रदायिक और समाज तोड़ने वाली होती हैं। अब इंटरनेट का इस्तेमाल सच बताने से ज़्यादा, झूठ गढ़ने और फैलाने के लिए किया जा रहा है।
इस्लामोफोबिया और अमेरिकी प्रोपेगेंडा मशीन
दरअसल, सोशल मीडिया और मुख्यधारा मीडिया पर झूठे नैरेटिव गढ़ने का खेल यहूदियों ने इजाद किया था। 9/11-2001 में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकवादी हमले के बाद जब अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने आतंकवाद के सफाए तक लड़ाई लड़ने की बात कही, तब “इस्लामिक आतंकवाद” की एक नई थ्योरी गढ़ी गई।
यद्यपि इसके पहले भी दुनिया में कई भयावह कत्लेआम हुए हैं, मगर कभी उन्हें किसी धर्म से नहीं जोड़ा गया, न ही किसी धर्म की विचारधारा को इसका जिम्मेदार ठहराया गया।
1984 में पंजाब का आतंकवाद हो, इंदिरा गांधी की सिखों द्वारा की गई हत्या हो या 1991 में राजीव गांधी की हत्या। उस दौर में लिट्टे सबसे बड़ा आतंकवादी संगठन था, मगर कभी यह नहीं कहा गया कि यह “हिंदू आतंकवाद” या “सिख आतंकवाद” है।
हिटलर ने 60 लाख यहूदियों की हत्या की, मगर उसके नरसंहार को कभी भी “ईसाई आतंकवाद” नहीं कहा गया। कंबोडिया में वहां के कम्युनिस्ट शासक खमेर रूज के सेना प्रमुख पोल पॉट के नेतृत्व में बुद्धिजीवियों, शहरी निवासियों और धार्मिक समूहों को निशाना बनाया गया और 1975-1979 के बीच देश की एक चौथाई आबादी का कत्ल करवा दिया गया। ऐसे ही रवांडा नरसंहार (1994) भी है, जहां लाखों लोगों का कत्लेआम हुआ, मगर इसका कारण भी किसी धर्म को नहीं ठहराया गया।
मिडिल ईस्ट में अमेरिका का हस्तक्षेप और झूठी सूचनाओं का प्रसार
मिडिल ईस्ट के तेल भंडारों पर निगाहें गड़ाए अमेरिका को 9/11 के बाद एक बहाना मिल गया और मिडिल ईस्ट के देशों के धर्म, इस्लाम, पर हमले के बहाने उनके तेल संसाधनों पर कब्जा करने का खेल शुरू हुआ।
इसके बाद स्टूडियो में गला काटने के वीडियो शूट कराए गए और उन्हें “इस्लामिक नाम वाले” फलां-फलां संगठनों द्वारा की गई आतंकी घटनाएं बताकर अमेरिकी मीडिया के जरिए प्रचारित किया गया, ताकि लोगों में डर फैलाया जा सके।
वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट बताती है कि अमेरिका ने स्टूडियो में सिर काटने के फर्जी वीडियो बनवाए और इस्लामिक नामों के साथ प्रचारित किया।
इस्लामोफोबिया का विस्तार: एक सोची-समझी साजिश
यद्यपि कुछ ऐसे आतंकवादी संगठन वास्तविक रूप में रहे भी होंगे तो उन्हें अमेरिका ने ही जन्म दिया, कभी वह अमेरिका के ही खासमखास थे जो बाद में अमेरिका द्वारा ही आतंकवादी घोषित हो गये।
इसके बाद तमाम मिडिल ईस्ट देशों के तेल खजाने पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका द्वारा कब्ज़ा कर लिया गया। तमाम देश अमेरिका के सामने झुक गये, जो नहीं झुके उन्हें ईराक और सद्दाम हुसैन बना दिया गया। यह इस्लाम विरोधी प्रोपगंडे की पहली जीत थी।
यहूदियों द्वारा इस्लाम विरोधी साजिश
इसके बाद यहूदियों द्वारा सीधे सीधे इस्लाम पर आक्रमण हुआ, चुंकि वैश्विक स्तर पर इंटरनेट और सोशल मीडिया उनके ही नियंत्रण में हमेशा से रहें हैं तो ऐसी इस्लाम विरोधी फर्ज़ी खबरों को वायरल करवाया गया।
आपको जानकर हैरानी होगी कि एक अनुमान के अनुसार इस्लाम और कुरआन नाम की लाखों वेबसाइट, यूट्यूब चैनल और सोशल मीडिया वेरीफाइड एकाउंट इन यहूदियों के द्वारा संचालित है जिसमें वह बहुत खामोशी से कुरान की आयतों के अनुवाद को बदल देते हैं, उसका मतलब ही बदल देते हैं और लोग उसे ही सच मान लेते हैं।
यही नहीं, इनके इस्लामिक विरोधी प्रोपगंडे में “ऊंट का पेशाब” भी एक प्रमुख खेल है, जिसकी शेखों के ड्रेस में मर्दों और अबाया में मुस्लिम औरत दिखाकर शूटिंग की जाती है और उसे सोशल मीडिया में फैलाया जाता है। उसपर झूठे आर्टिकल लिखे जाते हैं, इस्लाम नाम की वेबसाइट या वेरिफाईड एकाउंट से उसे प्रमोट किया जाता है।
साजिश बहुत गहरी है, इसे समझने की जरूरत है, मगर अफ़सोस तो यह है कि दूसरे को क्या कहें खुद खुद मुसलमान ही इसे नहीं समझ रहा है।
रावलपिंडी जेल में इमरान खान का बलात्कार नहीं हुआ यह तो स्पष्ट हो गया मगर अमेरिका की जेल में बंद न्यूरोसाइंटिस्ट आफ़िया सिद्दीकी का पिछले 17 सालों से लगातार बलात्कार हो रहा है।
दरअसल आफ़िया सिद्दीकी एक अमेरिकी नागरिक और न्युरो साइंटिस्ट हैं, उन्होंने अमेरिका में इस्लाम पर व्याख्यान देने शुरू किए। जिसे रोकने की कोशिशें हुईं, मगर उन्होंने चुप्पी नहीं साधी।अमेरिका में उनपर हत्या के प्रयास और अन्य अपराधों के लिए 2008 में गिरफ्तार किया और उन्हें 86 साल की सजा दी।
आफ़िया सिद्दीकी का अपने घर हफ्ते में एक दिन बातचीत का एक आडियो इंटरनेट पर उपलब्ध है जिसमें वह कह रहीं हैं कि ‘हर रात 5-5, 6-6 अमेरिकी सैनिक कैसे बेरहमी से उनका बलात्कार करते हैं , शाम होते ही इसकी शुरुआत होती है तो सुबह तक चलती है। यहां तक कि कुत्तों से बलात्कार कराया जाता है। जेल के कैदियों तक को उनके साथ बलात्कार के लिए भेजा जाता रहा है।
यदि यह संभव भी है कि आफ़िया सिद्दीकी दोषी है तो दुनिया के किसी कानून में किसी दोष की सज़ा बलात्कार नहीं है।
यह सच दबा दिया गया… मुसलमान भी इन्हें नहीं जानते, खैर उन्हें सोशल मीडिया पर चकल्लसबाजी करने और एक दूसरे की टांगें खींचने के कुछ आता भी नहीं।