आजकल हर छोटी-बड़ी सरकारी कार्रवाई को लेकर इतना शोर मचाया जाता है कि असली काम और दिखावे में फर्क करना मुश्किल हो गया है। कभी थाली बजाने की अपील होती है, तो कभी ताली पीटने की। अब ताज़ा मामला क्या 7 मई के मॉक ड्रिल का है।
फ्लाइट के टेकऑफ़ के वक्त केबिन के अंदर की लाइट इसलिए बुझा दी जाती है ताकि केबिन में अंधेरा हो जाए और फ्लाइट के टेकऑफ़ करते समय फ्लाइट में कहीं भी आग या चिंगारी दिखाई दे तो कंट्रोल रूम उसे देख सके।
इसी तरह सीट को सीधा कराया जाता है और सीधा बैठने को कहा जाता है ताकि टेकऑफ़ के समय केबिन का भार फ्लाइट की उड़ान के अनुरूप संतुलित हो सके।
उड़ान के समय मोबाइल या इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस फ्लाइट मोड में इसलिए कराए जाते हैं ताकि उड़ान के दौरान 400 यात्रियों के 400 से अधिक मोबाइल सिग्नलों से फ्लाइट की कंट्रोल टावर से कनेक्टिविटी में कोई अवरोध उत्पन्न न हो।
बाकी, दो दरवाज़े आगे हैं, दो पीछे हैं और दो बीच में हैं। सेफ्टी जैकेट आपकी सीट के नीचे है, ऑक्सीजन मास्क ऊपर से आएगा, उसे ऐसे लगा लें।
इत्यादि, इत्यादि…
यह सब इमरजेंसी के समय का मॉक ड्रिल है।
बस ऐसा ही कुछ कल होगा, मगर न एयर होस्टेस होंगी, न जहाज़ उड़ेगा, क्योंकि खबर है कि फ्रांस ने राफेल में मिसाइल लगाने का एक्सेस देने से मना कर दिया है।
मामला बस थाली बजाने जैसा ही है।