ऑपरेशन सिंदूर ने भारतीय सेना की ताकत और भरोसे को फिर से साबित कर दिया है। इस मिशन ने दिखाया कि 21वीं सदी की जंग अब सिर्फ बंदूक और टैंक से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तकनीक से लड़ी जाती है।
जहां ऑपरेशन सिंदूर की सफलता का श्रेय भारतीय सेना को जाता है, वहीं इस ऑपरेशन का निर्णय देश की सरकार के साहसिक फैसले को प्रतिबिंबित करता है।
ऑपरेशन सिंदूर की घोषणा ने भारत के वर्तमान नेतृत्व को जो साहसी होने का तमगा दिया था, उसे अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा किए गए युद्धविराम की घोषणा ने कमजोर कर दिया है। युद्ध के बीच अमेरिका की चौधराहट साफ नजर आई, जिसे देश के सामान्य जनमानस से लेकर अंतरराष्ट्रीय जगत ने भी देखा और महसूस किया है।
ट्रम्प की एंट्री और युद्धविराम को लेकर उनकी घोषणा ने देश की संप्रभुता की लक्ष्मण रेखा को लहूलुहान किया है, जिस पर हर संप्रभुता प्रेमी भारतीय को दुखी होना चाहिए और अपने-अपने बौद्धिक स्तर से चिंतन भी करना चाहिए।
दूसरी तरफ, ऑपरेशन सिंदूर की सफलता में वैज्ञानिक तकनीक का अहम रोल रहा, जिसे भारत ने रूस, अमेरिका, फ्रांस और इज़राइल जैसे देशों से खरीदा है। भारत और उसके राजनेता इस बात पर गर्व कर सकते हैं कि हमने इस तकनीक को खरीदा है, लेकिन यह खेद और चिंता का विषय होना चाहिए कि भारत ऐसी स्वदेशी तकनीक विकसित नहीं कर सका है। क्योंकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई भी तकनीक, तकनीक विकसित करने वाला देश उन्हीं देशों को बेचना चाहेगा, जो उनके अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने में सहयोगी की भूमिका में रहें। यानी किसी भी देश को अंतरराष्ट्रीय राजनीति में संप्रभुता के साथ रहने की पहली और अनिवार्य शर्त है—खुद का तकनीकी विकास।
भारत के वे सामाजिक संगठन, जो लाठी और तलवार प्रशिक्षण को देश रक्षा की प्राणवायु समझकर युवाओं को प्रशिक्षित कर रहे हैं, उन्हें ऑपरेशन सिंदूर में वैज्ञानिक तकनीक की उपयोगिता से सीख लेकर युवाओं को लाठी-त्रिशूल से प्रशिक्षित करने की जगह तकनीकी कौशल विकास के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए, ताकि देश अपनी संप्रभुता किसी ट्रम्प के हाथों लहूलुहान होने से बचा सके।