तुर्की की सबसे बड़ी ताकत बोस्फोरस और डार्डानेल्स जलसंधियां हैं, जो देश के बीचों-बीच से होकर गुजरती हैं। कई ताकतवर देश इन्हीं वजहों से तुर्की से संबंध खराब नहीं करते।
यह पूर्व युरोप को एशिया से मिलाने का एकमात्र द्वार है। बोस्फोरस इस्तांबुल में है, जबकि डार्डानेल्स (जिसे हेलेस्पोंट भी कहते हैं) एजियन सागर को मरमारा सागर से जोड़ती है।
इनके अलावा कोई और समुद्री रास्ता नहीं है जो एशिया से पूर्वी यूरोप तक जाता हो। इसी वजह से दुनिया के कई देशों, जिनमें भारत भी शामिल है, ने तुर्की के साथ बोस्फोरस जलसंधि और डार्डानेल्स जलसंधि से जुड़ी संधियां की हुई हैं।
ये दोनों जल संधियाँ काला सागर को एजियन सागर और भूमध्य सागर से जोड़ती हैं, पूर्वी यूरोप और एशिया के बीच समुद्री मार्ग स्थापित होता है। बिना इस संधि के कोई भी समुद्री मालवाहक जहाज एशिया से पूर्व युरोप नहीं जा सकता।
भारत के करीब 1,000 जहाज हर साल बोस्फोरस जलसंधि से होकर गुजरते हैं। आंकड़े के अनुसार 2019 में 360 जहाजों ने इस जल-संधि का उपयोग किया, और 2023 में बोस्फोरस और डार्डानेल्स दोनों से गुज़रने वाले भारतीय समुद्री जहाजों की संख्या लगभग 980 थी।
हर जहाज को तुर्की सरकार को टोल टैक्स देना होता है, जो जहाज के आकार, वजन और माल पर निर्भर करता है। जुलाई 2024 में यह दर $5.07 प्रति टन था। भारतीय कार्गो जहाज का वजन 20,000 नेट टन पर लगभग 85 लाख रुपये प्रति भारतीय जहाज तुर्की को देना पड़ता है।
प्रति वर्ष 1000 समुद्री जहाज गुज़रने पर भारत द्वारा तुर्की को भुगतान की जाने वाली कुल राशि लगभग 850 करोड़ रुपये है।
कुछ जहाजों को पायलटेज और टगबोट सेवाओं के लिए अतिरिक्त शुल्क देना पड़ता है, जो प्रति जहाज $5,000-$20,000 (4-16 लाख रुपये) तक हो सकता है। यह लागत जहाज के आकार और नेविगेशन की जटिलता पर निर्भर करती है।
कुल मिलाकर देखा जाए तो ये पूरा मामला लगभग 1,000 करोड़ रुपये का है। अगर भारत को तुर्की की कमर तोड़नी है, तो सबसे पहले अपने जहाजों को इस रास्ते से भेजना बंद करना होगा।
अर्थात सारा मामला करीब ₹1000 करोड़ का है, तुर्कीए की आर्थिक कमर तोड़ने के लिए सबसे पहले भारत को इधर से अपने जहाज भेजना बंद करना चाहिए।
नहीं तो कहीं तुर्किए ने पहले बहिष्कार कर दिया तो कितने हज़ार करोड़ का बिजनेस शून्य हो जाएगा सोचा नहीं जा सकता।