3 जून 2025 को सल्वाडोर के उत्तरी शहर चालतेनांगो की अदालत ने एक ऐसा ऐतिहासिक निर्णय सुनाया जिसकी गूँज दशकों तक अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार इतिहास में सुनाई देगी। पाँच महिला जूरी सदस्यों ने 1982 में चार डच पत्रकारों की सुनियोजित हत्या के मामले में तीन पूर्व सैन्य अधिकारियों, जनरल होस गिलर्मो गार्सिया (91), कर्नल फ्रांसिस्को मोरान (93) और कर्नल मारियो रेयेस मेना (85) को दोषी ठहराते हुए प्रत्येक को 15 वर्ष की कठोर कैद की सजा सुनाई।
यह फैसला मात्र एक दिन की त्वरित सुनवाई के बाद आया, जिसने सल्वाडोर की न्यायिक प्रणाली की क्षमता को रेखांकित किया। न्यायाधीश ने अपने फैसले में न केवल आरोपियों को दोषी ठहराया, बल्कि न्याय में 43 वर्षों की अकल्पनीय देरी के लिए सल्वाडोर सरकार को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया। इसके साथ ही राष्ट्रपति नायब बुकेले को पीड़ित परिवारों से सार्वजनिक माफी माँगने का ऐतिहासिक आदेश दिया गया, जो राज्य की नैतिक जवाबदेही को स्वीकार करने की दुर्लभ मिसाल है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह फैसला देश के गृहयुद्ध (1980-1992) से जुड़े हजारों अनसुलझे मामलों के लिए एक जीवंत आधार बनेगा, जहाँ सैन्य अत्याचारों को व्यवस्थित रूप से दबा दिया गया था।
17 मार्च 1982: सत्य की तलाश में मौत का घात
गृहयुद्ध की आग में झुलस रहे सल्वाडोर के चालतेनांगो प्रांत के सुनसान ग्रामीण इलाके में सुबह की शांति अचानक गोलियों की कर्कश आवाज से चीर दी गई। जन कुइपर, कोस कोस्टर, हंस टेर लाग और जोप विलेमसन चार डच पत्रकार जो वामपंथी विद्रोहियों पर एक ईमानदार डॉक्यूमेंट्री बना रहे थे, सेना की बर्बर घात में फँस गए। संयुक्त राष्ट्र की 1993 की विस्तृत रिपोर्ट ने खुलासा किया कि कर्नल मेना ने खुफिया जानकारी मिलते ही सैनिकों को पेड़ों और झाड़ियों के पीछे छिपकर घात लगाने का स्पष्ट आदेश दिया था।
अर्धसैनिक बलों ने एके 47 और एम 60 मशीनगनों से अंधाधुंध गोलियाँ बरसाईं, जिसमें पत्रकारों के साथ-साथ कम से कम पाँच विद्रोही भी तड़पते हुए मारे गए। घटना के बाद एक भयावह षड्यंत्र रचा गया: पत्रकारों के शवों को जानबूझकर विद्रोहियों के हथियारों के साथ सजाया गया ताकि उन्हें गुरिल्ला सहयोगी साबित किया जा सके।
अमेरिकी सैन्य अटैची कर्नल जॉन मैकब्राइड के बयान ने इसकी पुष्टि की हमले से ठीक पहले सल्वाडोर सेना ने अमेरिकी दूतावास को सूचित किया था, जो इस हत्या की पूर्वनियोजित प्रकृति को उजागर करता है। यह घटना शीत युद्ध के दौर में लैटिन अमेरिका में अमेरिकी हस्तक्षेप की काली छाया को भी दर्शाती है।
न्याय की लंबी यात्रा: धमकियाँ, राजनीति और अटूट संघर्ष
न्याय पाने का यह सफर एक दुर्गम संघर्ष साबित हुआ, जो सल्वाडोर की कमजोर न्यायिक व्यवस्था और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को उजागर करता है। 1988 में जब पहली बार यह मामला अदालत पहुँचा, तो जज फ़ैलिक्स गैरिडा को जानलेवा धमकियाँ मिलीं और केस को जानबूझकर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
1992 में गृहयुद्ध समाप्त होने के बाद सरकार ने आम माफी कानून (Ley de Amnistía) पारित किया, जिसने सैन्य अपराधियों को कानूनी संरक्षण का कवच प्रदान कर दिया। हालाँकि, 1993 में संयुक्त राष्ट्र के सत्य आयोग (UN Truth Commission) ने अपनी ऐतिहासिक रिपोर्ट में मेना को प्रत्यक्ष रूप से दोषी ठहराया और गार्सिया व मोरान की संलिप्तता का पर्दाफाश किया।
निर्णायक मोड़ 13 जुलाई 2016 को आया, जब सल्वाडोर की सर्वोच्च अदालत ने माफी कानून को असंवैधानिक घोषित कर दिया। इसके बाद डच सरकार और यूरोपीय संघ ने लगातार राजनयिक दबाव बनाया। 2022 में पीड़ित परिवारों ने संयुक्त रूप से केस दायर किया, जिसमें जन कुइपर के भाई गर्ट कुइपर की अथक मुहिम ने निर्णायक भूमिका निभाई। गर्ट ने बताया कि हर साल अपने भाई की कब्र पर जाकर उनसे माफी माँगना उनके लिए एक यातना थी: मुझे कहना पड़ता था; माफ करना, अभी तक न्याय नहीं मिला।
सत्य की अंतिम विजय
जब 91 वर्षीय गार्सिया को अस्पताल के बिस्तर पर ही सजा सुनाई गई, तो यह दृश्य उस अटल सत्य का प्रतीक बन गया कि समय और मृत्यु भी अपराध को माफ नहीं करते। यह फैसला केवल एक कानूनी निर्णय नहीं, बल्कि मानवीय संकल्प की जीत है।
43 वर्षों के संघर्ष ने साबित किया कि सैन्य तानाशाही द्वारा सत्य को दफनाने की कोशिशें अंततः इतिहास के न्यायाधिकरण के सामने विफल होती हैं। यह मामला दुनिया भर के संघर्ष क्षेत्रों में जोखिम उठाकर काम कर रहे पत्रकारों के लिए एक सन्देश है, बंदूक की नली सच्चाई को हमेशा के लिए चुप नहीं करा सकती।
कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स के अनुसार, 1992 से अब तक सल्वाडोर में 25 पत्रकार मारे जा चुके हैं, और यह फैसला उनकी स्मृति को समर्पित है। जैसा कि डच विदेश मंत्री हाँके ब्रूइन्स स्लोट ने कहा: यह न्याय की लड़ाई में एक मील का पत्थर है, जो दर्शाता है कि साहस और दृढ़ता अंततः अंधकार पर प्रकाश की विजय सुनिश्चित करती है। सल्वाडोर के इतिहास का यह काला अध्याय अब न्याय की एक जीवंत मशाल बन गया है, एक ऐसी मिसाल जो साबित करती है कि सत्य के लिए संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता।