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नीतीश कुमार के राज में बर्बादी की ओर बढ़ता बिहार: आम बिहारी की बेबसी की कहानी

बिहार, जो कभी शिक्षा और संस्कृति की मिसाल था, आज बेरोजगारी, पलायन और बदहाल स्वास्थ्य-शिक्षा व्यवस्था से जूझ रहा है। वादे हुए कई, पर ज़मीनी हालात अब भी जस के तस हैं।

बिहार कभी शिक्षा, संस्कृति और संघर्ष की पहचान हुआ करता था। नालंदा और विक्रमशिला की विरासत, चंपारण का आंदोलन, और बुद्ध की करुणा, ये सब इसी धरती में गहराई से जुड़ी थीं। लेकिन आज हालत कुछ और ही है। अब यहां सपने टूटते जा रहे हैं, और लोग संघर्ष की जगह बेहतर ज़िंदगी की तलाश में राज्य छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं।

जब नीतीश कुमार ने शासन संभाला था, तो लोगों को एक नई उम्मीद जगी थी। उन्होंने वादा किया था, सुशासन, विकास, और कानून के राज का। नके वादों ने आम आदमी के दिल में एक नई उम्मीद जगा दी थी। शुरुआती कुछ सालों में लगा कि राज्य सही दिशा की और जा रही है, उम्मीदें ताजा होने लगी थीं। लेकिन समय के साथ जैसे-जैसे सत्ता स्थिर हुई, विकास की तस्वीर धुंधली पड़ती गई। जो बदलाव शुरू हुए थे, वे रुक गए। और जो वादे किए गए थे, वे फाइलों और भाषणों में सिमटकर रह गए।

आज की स्थिति यह है कि आम लोग पूछ रहे हैं, कहां है वो विकास? कहां है वो शिक्षा सुधार, रोजगार और स्वास्थ्य सेवाएं जिनका वादा किया गया था?

शिक्षा: सिर्फ डिग्री मिलती है, ज्ञान नहीं

कभी बिहार को शिक्षा की धरती कहा जाता था, नालंदा और विक्रमशिला जैसी विश्वविद्यालयों की धरती। लेकिन आज की हकीकत यह है कि यहां डिग्री तो मिलती है, लेकिन ज्ञान नहीं।

सरकारी स्कूलों की हालत इतनी बदतर है कि वहां शिक्षक तो हैं, लेकिन पढ़ाने वाला कोई नहीं हैं। कुछ शिक्षक स्कूल में स्वेटर बुनते हैं, कुछ मोबाइल पर लगे रहते हैं, और कुछ तो स्टाफ रूम में बैठकर गप्पे लड़ाते हैं।
जब कोई छात्र या अभिभावक पढ़ाई की बात करता है, तो जवाब मिलता है:

जाइए जो करना है कर लीजिए, हम तो यही करते हैं, और सरकार भी इसी के पैसे देती है।

स्कूलों में किताबें तो हैं, लेकिन पढ़ाई नहीं होती। न कोई शिक्षण पद्धति, न बच्चों में सीखने की उत्सुकता, क्योंकि माहौल ही नहीं बचा है। मिड-डे मील के नाम पर खाना मिलता है, लेकिन पढ़ाई के नाम पर बच्चों को बस ‘थेंगा’ दिखाया जाता है।

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आज हालत यह है कि गरीब से गरीब मां-बाप भी अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल भेजने को मजबूर हैं क्योंकि सरकारी स्कूल में पढ़ाई का मतलब ही खत्म हो गया है।

लेकिन सवाल यह है कि गरीब कहां से लाएगा फीस?
जब पेट भरने की चिंता हो, तो प्राइवेट कोचिंग और स्कूल का खर्चा उठाना नामुमकिन हो जाता है।

सरकारी स्कूल, जो गरीब बच्चों के भविष्य का सहारा होना चाहिए था, आज सिर्फ एक औपचारिकता बनकर रह गया है। कई छात्र मजबूरी में स्कूल आते हैं सिर्फ मिड-डे मील के लिए, क्योंकि पढ़ाई का कोई फायदा उन्हें दिखता ही नहीं।

और कॉलेजों की हालत इससे अलग नहीं, वहां पुराना सिलेबस, मनमानी परीक्षा तिथि, और कभी-कभी सालों की देरी अब आम बात हो गई है। मैंने खुद अपने आस परोस में देखा हैं की B.A. की पढ़ाई 3 साल की जगह 5 साल में पूरी की हैं, और पढ़ाई का स्तर ऐसा था कि डिग्री हाथ में आने के बाद भी आत्मविश्वास शून्य था।

क्या ऐसी व्यवस्था से एक शिक्षित बिहार बन सकता है?
जब शिक्षा खुद दम तोड़ रही हो, तो भविष्य की बात करना सिर्फ एक झूठा सपना लगता है।

बिहार का बच्चा आज मजबूरी में पढ़ाई के लिए घर छोड़ता है, क्योंकि यहां के स्कूलों में दीवारें हैं, कमरे हैं, लेकिन पढ़ाई नहीं है। किताबें हैं, पर सिखाने वाला कोई नहीं।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हर मंच से यही गिनवाते हैं कि हमने ये किया, वो किया, इतने स्कूल खुलवाए, लेकिन सच्चाई ये है कि उन स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती, बच्चा पढ़े या ना पढ़े, मास्टर जी को तो बस अपनी तनख्वा, तबादला और ऊपर के साहब से सिफारिश की चिंता रहती है। शिक्षा अब सिर्फ दिखावे की चीज़ बन गई है, हकीकत में ज्ञान कहीं नहीं मिलता।

इसीलिए बिहार का नौजवान आज पढ़ने और आगे बढ़ने के लिए अपने गांव, अपना घर छोड़कर दूसरे राज्यों जैसे दिल्ली, मुंबई, बंगाल जैसे दूसरे राज्यों में जाता है। और जैसे ही चुनाव नज़दीक आता है, सुशासन बाबू की सरकार फिर से वही पुराना राग अलापने लगती है, बिहार बदल रहा है।

लेकिन सवाल ये है: क्या सच में बिहार बदल रहा है… या सिर्फ भाषणों में?

बेरोजगारी: पढ़े-लिखे युवा दर-दर की ठोकरें खाते हैं

बिहार में शिक्षा के बाद अगला सबसे बड़ा धोखा है, रोजगार। हर साल लाखों युवा पढ़ाई पूरी करते हैं, लेकिन उनके लिए ना तो सरकारी नौकरियां हैं, ना ही निजी क्षेत्र में पर्याप्त अवसर।

जो भर्तियां निकलती भी हैं, उनमें परीक्षा का आयोजन सालों तक खिंचता है, और जब कभी परीक्षा होती है, तो या तो पेपर लीक हो जाता है, या फिर रिजल्ट रद्द कर दिया जाता है। हजारों युवाओं की ज़िंदगी सिर्फ एक भर्ती की प्रतीक्षा में रुक जाती है।

ऐसा नहीं है कि ये युवा मेहनत नहीं करते, वे दिन-रात पढ़ते हैं, कोचिंग करते हैं, परिवार की उम्मीदों को लेकर जीते हैं। लेकिन सिस्टम इतना जर्जर है कि हर कोशिश अंत में निराशा में बदल जाती है।

अगर कहीं कोई private नौकरी मिल भी जाए, तो सैलरी इतनी कम होती है कि इंसान अपने परिवार का पेट नहीं भर सकता। ₹6,000 से ₹8,000 की नौकरी में कोई कैसे खुद को भी चला पाएगा, और घर वालों को भी देखेगा?

कई युवाओं से बात की है, उनका कहना है:

बिहार में रोजगार नहीं है, इसीलिए बाहर जाना पड़ता है। अगर यहीं नौकरी मिलती, तो कौन अपना गांव-घर छोड़ना चाहता है?

रोजगार के नाम पर बिहार के युवाओं को सिर्फ वादे मिले हैं, और जब भी चुनाव आता है तो उन्हें बेरोजगारी भत्ता या नौकरी के सपने दिखाए जाते हैं, जो कभी पूरे नहीं होते।

क्या यही भविष्य है उस राज्य का, जहां सबसे ज़्यादा युवा आबादी है?
अगर युवा ही निराश हो जाएंगे, तो समाज कैसे आगे बढ़ेगा?

स्वास्थ्य सेवा: बीमार होना मतलब भगवान भरोसे

बिहार में अगर आप बीमार पड़ जाएं, तो समझ लीजिए, भगवान के भरोसे ही हैं। क्योंकि सरकारी अस्पतालों की स्थिति इतनी खराब है कि वहां इलाज की उम्मीद करना अपने आप में एक संघर्ष बन गया है।

पीएमसीएच (पटना मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल) जैसे राज्य के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में भी मरीजों को सम्मान नहीं, बल्कि अपमान मिलता है। मरीज दर्द से कराहता है और डॉक्टर से मदद की उम्मीद करता है, लेकिन बदले में सुनने को मिलता है:

जो करना है कर लो, मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

हाल ही में एक मामला सामने आया जब यूट्यूबर मनीष कश्यप को पटना के पीएमसीएच अस्पताल में डॉक्टरों द्वारा पीटा गया। उनका ‘कसूर’ सिर्फ इतना था कि उन्होंने मरीजों और अस्पताल की बदहाली पर सवाल उठाया। कई मामलों में डॉक्टर मरीजों को मारते-पीटते भी देखे गए हैं, इलाज तो दूर की बात है, वहां इंसानियत तक की कोई जगह नहीं बची हैं।

गांव-देहात की बात करें तो वहां प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) सिर्फ कागज़ों पर चलते हैं।
डॉक्टर महीने में एक बार आते हैं, वो भी सिर्फ फॉर्मलिटी के लिए। यहाँ अक्सर दवाएं उपलब्ध नहीं होतीं, सफाई का अभाव है, और इस्तेमाल होने वाले उपकरण भी पुराने जमाने के हो चुके हैं।

गांव में कई महिलाएं एंबुलेंस नहीं मिलने के कारण गांव की सड़कों पर बच्चों को जन्म देती हैं। क्या यह 2025 का भारत है, या 1925 का?

अस्पतालों में डॉक्टर नहीं मिलते, मिलते हैं तो मरीजों से बुरा व्यवहार। नर्सिंग स्टाफ की कमी, मशीनें कबाड़ में बदल चुकी हैं, और गरीब मरीजों के साथ भेदभाव आम बात है। स्वास्थ्य का अधिकार अब एक कानूनी शब्द बनकर रह गया है, जिसकी असल ज़मीन पर कोई कद्र नहीं।

जब इलाज के लिए इंसान को भीख मांगनी पड़े, और सिस्टम उसे थप्पड़ मारे, तो समझिए कि वह राज्य बीमार नहीं, मरणासन्न है।

कानून व्यवस्था: आम आदमी के लिए न्याय दूर की बात

बिहार की कानून व्यवस्था आज ऐसे मोड़ पर है जहां आम आदमी को न्याय पाना एक सपना बन गया है, खासकर अगर वह गरीब, दलित, या मध्यमवर्गीय है।

आज भी गांव हो या शहर, अगर कोई आम आदमी थाने जाता है, तो उसे पहले अपनी सामाजिक हैसियत बतानी पड़ती है।
अगर आपके पास पैसा, पहुंच, या राजनीतिक संबंध नहीं है, तो आपकी बात सुनना तो दूर, आपको ही फंसाने की धमकी मिलने लगती है।

कई मामलों में देखा है, जहां पीड़ित व्यक्ति थाने में रिपोर्ट लिखवाने जाता है, और वहां से पुलिस वाले कहते हैं:

सोच लो… मामला उल्टा भी पड़ सकता है। बहुत ऊपर तक बात जाएगी, तुम नहीं झेल पाओगे।

इसका मतलब सीधा है, पुलिस प्रशासन पूरी तरह दबाव में काम कर रहा है, और उस पर नेताओं, बाहुबलियों और धनबलियों का असर साफ दिखाई देता है।
कई बार तो ऐसा लगता है जैसे कानून सिर्फ अमीरों और प्रभावशाली लोगों की सुरक्षा के लिए बना हो, बाकियों के लिए नहीं। अगर कोई दलित, पिछड़ा या मध्यमवर्गीय व्यक्ति अन्याय का शिकार होता है, तो उसे पहले यह साबित करना पड़ता है कि वो दोषी नहीं है, जबकि असली अपराधी खुलेआम घूमते रहते हैं।

यह कैसा कानून का राज है, जिसमें इंसाफ मांगना ही जुर्म बन जाता है?

आम बिहारी की बेबसी यही है, उसे न शिक्षा में अधिकार है, न रोजगार में अवसर, और न ही न्याय में भरोसा।

पलायन: अपनी ही मिट्टी छोड़ने की मजबूरी

बिहार के लाखों युवा हर साल मजबूरी में अपने गांव, अपने शहर और अपने परिवार को छोड़कर दिल्ली, पंजाब, गुजरात या मुंबई जैसे शहरों की ओर पलायन करते हैं। ये सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, ये एक पीढ़ी का पलायन है, जो अपने सपनों को बचाने के लिए अपनी जड़ों से कट रही है।

कई युवाओं से बात की है, जो मेरे जैसे ही किसी गांव या छोटे शहर से आते हैं। उनमें से एक ने कहा:

बिहार में नौकरी ही नहीं है भैया। मिलती भी है तो 6 से 8 हजार की। अब आप ही बताइए, इतने में खुद खाऊँगा या परिवार को खिलाऊँ?

एक और युवक बोला:

सरकारी नौकरी के फॉर्म तो भरते भरते थक गए। कभी पेपर लीक, कभी रद्द, कभी कोर्ट केस, अब तो लगने लगा है कि पढ़ाई बेकार चली गई।

यह दर्द सिर्फ उनका नहीं, हम सबका है। जब अपने ही राज्य में कोई उम्मीद न बचे, तो लोग भले ही मजबूरी में जाएं, लेकिन दिल यहीं छूट जाता है। ट्रेन की हर एक बोगी, बस की हर एक सीट, बिहार के उन सपनों से भरी होती है जो कभी यहीं पूरे होने वाले थे।

क्या यही है “विकास”?
जब कोई राज्य अपने युवाओं को रोक न पाए, उन्हें अवसर न दे पाए — तो उसे विकासशील नहीं, संघर्षशील कहा जाना चाहिए।

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शिवम कुमार एक समर्पित और अनुभवी समाचार लेखक हैं, जो वर्तमान में OBCAWAAZ.COM के लिए कार्यरत हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में गहरी रुचि रखने वाले शिवम निष्पक्ष, तथ्यात्मक और शोध-आधारित समाचार प्रस्तुत करने के लिए जाने जाते हैं। उनका प्रमुख फोकस सामाजिक मुद्दों, राजनीति, शिक्षा, और जनहित से जुड़ी खबरों पर रहता है। अपने विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण और सटीक लेखन शैली के माध्यम से वे पाठकों तक विश्वसनीय और प्रभावशाली समाचार पहुँचाने का कार्य करते हैं। शिवम कुमार का उद्देश्य निष्पक्ष और जिम्मेदार पत्रकारिता के जरिए समाज में जागरूकता फैलाना और लोगों को सटीक जानकारी प्रदान करना है।

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