₹8458 करोड़ की लागत से खरीदे गए दो बोइंग 777-300ER लक्ज़री विमान सिर्फ उड़ान के लिए नहीं थे, वे भारत की बढ़ती वैश्विक छवि के प्रतीक बनाए गए थे। बीते 11 वर्षों में इन जहाज़ों ने दर्जनों देशों का दौरा किया, करोड़ों रुपये खर्च हुए, और हर बार एक नया तमाशा रचा गया। कहीं ‘नमस्ते ट्रंप’, कहीं ‘हाउडी मोदी’, तो कहीं रंग-बिरंगे समारोहों में विदेशी भीड़ बुला कर यह जताया गया कि भारत अब विश्वगुरू बनने की ओर अग्रसर है।
लेकिन जैसे ही वास्तविक चुनौती सामने आई, वह चमकदार परत झड़ने लगी। जिन देशों को वर्षों तक गले लगाया गया, जिनके साथ शाल ओढ़कर झूले झुलाए गए, वही मुश्किल वक़्त में साथ नहीं आए। वो देश, जिन्हें हमने बार-बार प्राथमिकता दी, उन्होंने संकट के समय आंखें फेर लीं। दूसरी तरफ, तुर्की और चीन जैसे देश खुलेआम पाकिस्तान के साथ खड़े हो गए।
असल में, विदेश नीति तस्वीरों, नारों और मंचों पर तालियों से नहीं चलती। वह चलती है गहरी कूटनीति, दीर्घकालिक विश्वास और सामरिक संतुलन से। भारत ने पिछले कुछ सालों में बहुत अधिक ज़ोर इवेंट्स पर दिया—ब्रांडिंग पर, मंच सजाने पर, और कैमरे की चमक पर। लेकिन जब बात असली साझेदारी की आई, तो ज़्यादातर देशों की चुप्पी साफ संदेश दे गई।
यह समय है ठहरकर सोचने का। क्या हम सिर्फ इवेंट मैनेजमेंट करते रहेंगे या एक ऐसी विदेश नीति अपनाएंगे जो संकट के समय कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले देशों की एक ठोस सूची पेश कर सके? महज़ “नमस्ते” कह देने या डिनर टेबल शेयर कर लेने से भरोसा नहीं बनता। रिश्ते तब बनते हैं जब ज़रूरत के वक़्त कोई आपके साथ खड़ा हो।
अब भारत की जनता को यह फैसला करना होगा कि वह असली समर्थन चाहती है या सिर्फ ग्लैमर में लिपटी छवियां। जब दुश्मन सरहद पर खड़ा हो और तथाकथित मित्र चुप्पी साध लें, तब ‘विश्वगुरू’ बनने का दावा महज़ आत्ममुग्धता से ज़्यादा कुछ नहीं लगता।
क्योंकि अंत में, दुनिया मंच नहीं, मंजर देखती है। और जब मंजर में कोई आपके साथ खड़ा न दिखे, तो सारे मंच, सारी लाइटें और सारे इवेंट्स सिर्फ एक दिखावा भर रह जाते हैं।